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मयंक मैनाली, रामनगर

संगीत के मर्मज्ञ पं. भीमसेन जोशी से प्रेरित है, कला को समर्पित यह परिवार

संगीत के कार्यक्रम, कार्यशाला और संगीत विद्यालय से फैला रहे संगीत का प्रकाश

स्वयं शिक्षित होकर हुनरमंद तो कोई भी बन जाता है, लेकिन विशेषता तब है, जब उस शिक्षा को हम दूसरों को शिक्षित करने में प्रयोग करें। इसी बात को शास्त्रीय संगीत की विधा में चरितार्थ कर रहा है रामनगर का पाठक परिवार। एक बेहद छोटे से कस्बे में अब विलुप्त हो रहे शास्त्रीय संगीत की विधा के प्रति युवाओं में अलख जगाने की पाठक परिवार की यह पहल काबिले तारीफ है।

मौजूदा दौर में समाज पर तेजी से बढती आधुनिकता की चकाचौंध का प्रभाव संगीत के क्षेत्र में भी पडा है। पाश्चायात संगीत के पीछे भागती युवा पीढी के बीच पुरातन भारतीय संस्कृति की विधा शास्त्रीय संगीत को जीवंत रखने का कार्य बेहद कठिन है, लेकिन असंभव नहीं, कुछ इसी तर्ज पर कार्य कर रहा है रामनगर का पाठक परिवार।

तीसरी पीढी में भी शास्त्रीय संगीत की संस्कृति को जीवंत कर रहा पाठक परिवार

इस परिवार की आज न सिर्फ तीसरी पीढी संस्कृति को सहजने का कार्य कर रही है बल्कि यह परिवार क्षेत्र के अन्य छात्रों-युवाओं को भी शास्त्रीय संगीत की दीक्षा दे रहा है। इस परिवार की एक छोटे से कस्बे रामनगर में शास्त्रीय संगीत की विधा और संस्कृति को जीवंत रखने की यह पहल बेहद सराहनीय है। रामनगर में युवाओं को शास्त्रीय संगीत के प्रति जागरूक करने वाले और इसी संगीत के क्षेत्र में समय-समय पर अभिनव प्रयोग करने वाले और विशारद कर चुके मोहन पाठक बताते हैं, कि उन्होंनेे संगीत की बारीकियां अपने पिता हीराबल्लभ पाठक से ही सीखीं हैं।

आज वयोवृद्व हो चुके हीराबल्लभ पाठक भी क्षेत्र के प्रमुख संगीतकार रह चुके हैं। मोहन पाठक बताते हैं, कि वर्ष 1980 के आस-पास रामनगर में मंदिरों, घरों की मंडली, भजन, कुमांऊनी होली के गायन-वादन का माहौल था। उनके पिता वन विभाग में कर्मी थे, तथा संगीत विशेषकर शास्त्रीय संगीत के प्रति गहरी रूचि रखते थे। परिवार से विरासत में मिले इस माहौल ने मोहन पाठक को संगीत की ओर सहसा आकर्षित किया।

वह कहते हैं, कि लगभग 14-15 वर्ष की आयु में उन्होंने शास्त्रीय संगीत के जाने-माने व्यक्तित्व पंडित भीमसेन जोशी की राग दुर्गा को सुना। जो कि पर्वतीय संगीत के बेहद करीब होने के चलते उन्हें आकर्षित कर गया। इसके बाद उन्होंने भातखंडे संगीत विद्यापीठ लखनऊ से विशारद किया। जहां उन्होंने पंडित गौरव प्रसाद मिश्रा से संगीत का ज्ञान प्राप्त किया।

मोहन बताते हैं, कि कुछ समय दिल्ली के खेलगांव में संगीत की शिक्षा लेने के बाद उन्होंने शास्त्रीय संगीत के प्रसार के लिए क्षेत्र में युवाओं को जागरूक करने का मन बनाया। जिसके चलते वर्ष 2000 में उन्होंने स्वर साधना समिति बनाकर स्वर साधना संगीत विद्यालय की स्थापना की। जिसमें भातखंडे संगीत विद्यापीठ के द्वारा प्रथमा से विशारद तक के पाठयक्रम संचालित किए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त वह निरंतर रामनगर में संगीत के कार्यक्रम आयोजित करवाते रहते हैं। बीते पांच वर्षों से अब तक लगभग 30 के आस-पास वह संगीत के ऐसे कार्यक्रम क्षेत्र में आयोजित करवा चुके हैं, जिससे युवाओं में शास्त्रीय संगीत के प्रति ललक पैदा हो सके। मोहन कहते हैं, कि उनका लक्ष्य पुरातन भारतीय संस्कृति की इस विधा को भविष्य की पीढियों को सौंपना है। बेहद छोटे लेकिन बडे उदेश्यों के साथ संगीत की कला के प्रति समर्पित इस परिवार की यह पहल बेहद सराहनीय है।

दादा, पुत्र और पोते- पोती तक संगीत अनुरागी है यह परिवार


रामनगर। रामनगर का पाठक परिवार तीन पीढियों से शास्त्रीय संगीत विधा को जीवंत रखे हुए है। वन विभाग में कर्मी रहने के बावजूद हीराबल्लभ पाठक क्षेत्र में संगीत की अलख जगाने का कार्य करते रहे। उनके पुत्र मोहन पाठक जहां स्वर साधना संगीत विद्यालय चलाकर क्षेत्र के युवाओ को शास्त्रीय संगीत की विधा का ज्ञान दे रहे है, वहीं दूसरे पुत्र तथा मोहन पाठक के छोटे भाई दिनेश चंद्र पाठक पौडी जनपद के जयहरीखाल इंटर कालेज में संगीत विषय अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। इसके अलावा मोहन पाठक के पुत्र दिवाकर, धीरेन्द्र और पुत्री भारती भी शास्त्रीय संगीत में विशारद कर चुके हैं।

स्थानीय युवाओं को रोजगार भी प्रदान कर रही है संगीत की शिक्षा


रामनगर। स्वर साधना संगीत विद्यालय जहां एक ओर शास्त्रीय संगीत का उजियारा प्रसारित कर रहा है, वहीं यह युवाओं के लिए रोजगार देने की दिशा भी दे रहा है। मोहन पाठक बताते हैं कि वर्ष 2000 में उनके द्वारा संचालित विद्यालय में मात्र एक छात्र था, जो कि आज उनके पास 100 से अधिक छात्र हैं।

उनके स्वर साधना संगीत विद्यालय से अभी तक शिक्षा प्राप्त कर चुके 37 छात्र-छात्राएं सरकारी क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जबकि 500 से अधिक की संख्या में छात्र-छात्राएं संगीत के क्षेत्र में सेवा कर रहे हैं, जिसमें होटल, रिर्जोटों में होने वाले संगीत आयोजनों के अलावा संगीत के अन्य कार्यक्रमों में उनके द्वारा शिक्षित छात्र-छात्राएं प्रतिभाग करते रहते हैं, शास्त्रीय संगीत की इस विधा के माध्यम से संगीत के प्रचार-प्रसार के साथ ही अपनी आजीविका का संचालन भी कर रहे हैं।

मोहन पाठक बताते हैं कि उनका अगला लक्ष्य एक ऐसे क्लब या संस्था का गठन करना है जिससे वह अन्य राज्यों के कलाकारों को यहां बुलाकर उनकी लोकसंगीत संस्कृति की जानकारी यहां और यहां की लोकसंगीत की सांस्कृतिक पहचान से उनको रूबरू करवाना है।

बेहद कठिनता से भरी है, इस विधा को प्रसारित करने की डगर


रामनगर। छोटे से शहर रामनगर में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन करवाना बेहद कठिनता से भरा है। मोहन पाठक बताते हैं कि उन्होंने रामनगर में कार्यक्रम की शुरूआत पंडित कृष्ण नारायण भातखंडे की हर वर्ष 10 अगस्त को जयंती करवाने के साथ की थी।

लेकिन इसके बाद उन्होंने अन्य अवसरों पर भी कार्यक्रम शुरू करवाए। उनका कहना है कि कार्यक्रमों के लिए आर्थिक संसाधन, दर्शक जुटाना बेहद कठिन कार्य पडता है। इसके अतिरिक्त मंचीय प्रदर्शन के लिए ऐसे कलाकार चाहिए होते है, जो कि अच्छे स्तर का प्रदर्शन पूर्व में कर चुके हों। ऐसे में उनका मेहनताना आदि जुटा पाना बेहद कठिन कार्य है।

वह कहते हैं कि आज की पीढी समर्पण और धैर्य नहीं जुटा पाती है, जो कि इस विधा में बेहद आवश्यक है, आज के युवा शार्टकट अपनाना चाहते है, जो कि इस विधा में संभव नहीं है।


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