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  • राजनेताओं,प्रशासनिक अधिकारियों, भू- माफियाओं के गठजोड से हुआ खेल।
  • आरटीआई में खुलासे के सात साल बाद भी नहीं हुई कोई कार्यवाही।

मयंक मैनाली, रामनगर।

सूबे में जीरो टाॅलरैस का दावा करने वाली सरकार के दावे में कितनी सच्चाई है, इसका खुलासा यह खबर करती है। प्रदेश में भ्रष्टाचार कितना चरम पर है, इसकी बानगी रामनगर में आकर देखी जा सकती है। इस खबर में प्रकाशित यह मामला बेहद पेचीदा, हैरान करने वाला और बहुत पुराना है। खबर इस बात को स्पष्ट करती है कि भ्रष्टाचार की जडे हमारे सिस्टम में कितनी गहराई से अपनी पकड बना चुकी हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय रामनगर के मोहल्ला गुलरघट्टी, मंगलार रोड पर उस समय में तत्कालीन उत्तर प्रदेश परिवहन को 24 बीघा जमीन आवंटित हुई थी। जिसमें रामनगर डिपों को स्थापित किया जाना था। यह 90 के दशक के आसपास का मामला है। उस समय रामनगर का बस डिपो जहां आज प्रगतिशील रामलीला मैदान हुआ करता है, वहां पर अस्थाई रूप से चलता था। गौरतलब है कि वर्ष 1960 के आस-पास रामनगर के पैंठपडाव में एक छोटे से कमरे से बसों को संचालित किया जाता था। जो कि वर्ष 2000 तक संचालित होता रहा। समय के साथ परिवर्तन आता गया रामनगर में बस स्टेशन बनाने की मांग तूल पकडती चली गई। उस समय रामनगर से बसें भी काशीपुर डिपो के नाम से संचालित होती थी। रामनगर के राजनैतिक, सामाजिक, छात्रसंघ संगठनों के बैनर तले रामनगर में स्टेशन निर्माण की मांग शुरू हुई। यही नहीं उस समय उत्साह से लबरेज व जनमुददों पर लड रहे आंदोलनकारियों ने शासन-प्रशासन का विरोध करते हुए वर्ष 1992 में पहले वर्तमान में घासमंडी व लीसा डिपो में कब्जा करते हुए बसों का संचालन भी शुरू करवाया था। जिसके लिए स्थानीय नागरिकों व इन संगठनों के प्रयासें से तत्कालीन लघु व्यापार मंडल और स्थानीय सहयोग लेते हुए यात्रियों के लिए सुविधाएं भी जुटाने का प्रयास किया। वहीं इस आंदोलन को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कुचलने का पूरा प्रयास किया। आंदोलनकारियों की पुलिस ने निर्मम पिटाई करते हुए उनको काशीपुर की जेल में बंद भी कर दिया। लेकिन भारी आंदोलन और जनता की मांग, यात्रियों को बेहतर सुविधा देने इसको देखते हुए रामनगर के मंगलार रोड मोहल्ला गुलरघट्टी में रामनगर का बस डिपो बनाने के लिए 24 बीघा जमीन का आवंटन हुआ। जिसमें रामनगर से बसें संचालन, और रखरखाव करने का निर्णय लिया गया। वर्तमान मे जो बस स्टेशन है इसे अस्थाई तौर पर स्टेशन संचालित करने के लिए लीज पर लिया गया। इसका ख्ुालासा एक आरटीआई में वर्ष 2013 में रामनगर के एक आरटीआई एक्टिविस्ट अजीम खान की आरटीआई में हुआ है। आरटीआई कार्यकत्र्ता की लगाई सूचना के अधिकार में पता चला कि यह वह भूमि है जिस पर कुछ स्थानीय राजनेताओं, तत्कालीन अधिकारियों, रसूखदारों, भू-माफियाओं ने आपसी मिलीभगत से गडबडझाला कर इस जमीन पर प्लाटिंग कर प्लाट काट कर बेच डाले। आज जिस जमीन पर रामनगर का बस डिपो बनना था आज वहां प्रशासनिक लचरता के चलते मकान, दुकान, और पूरी कालोनी खडी हो गई है। बेशर्मी की हद यह है कि 2013 में सूचना के अधिकार में जानकारी मिलने के बाद भी आज तक प्रशासन द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। उल्टे इस मामले में आरोपियों को बचाने के भरसक प्रयास किए गए। यहां सबसे हैरत की बात यह है कि वर्तमान में जो रामनगर का बस स्टेशन है वह लीज की जमीन पर चल रहा है। जबकि जो वास्तविक भूमि है जिस पर बस स्टेशन का निर्माण होना था वहां आज अवैध तरीके से काटी गई कालोनी खडी है। सबसे खास बात यह है कि तकरीबन 24 बीघा यह भूमि मंगलार रोड, रामनगर में स्थित है, जो शहर से सटी हुई है। इसकी कीमत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है। इस पूरे मामले में वर्तमान में परिवहन निगम के साथ ही नगर पालिका परिषद, राजस्व विभाग भी समान रूप से दोषी हैं। वर्ष 1992 में तत्कालीन जिलाधिकारी नैनीताल के आदेश पर रामनगर पेशकार द्वारा परिवहन विभाग को रोडवेज बस स्टेशन संचालित करने के लिए कब्जा सौंपा गया। लेकिन यहां स्पष्ट है कि जिन विभागों को इसका रख-रखाव तथा देखभाल करनी थी, उन्होंने ही इसकी सौदेबाजी में सहयोग किया। इस बात के स्पष्ट प्रमाण है कि इस भूमि के भू-अभिलेखों में छेडछाड का भरसक प्रयास किया गया है। मजेदार बात यह है कि वर्तमान में जिस लीज की भूमि पर रामनगर का बस स्टेशन संचालित हो रहा है, उसका अनगिनत बार शिलान्यास हो चुका है, तथा कई बार धनराशि स्वीकृत करी जा चुकी है। यहां भी सरकारी धन का दुरूपयोग जमकर हो रहा है। यहां तक की यहां बस पोर्ट बनाने की बात भी कही जा चुकी है। जिस बस स्टेशन के लिए रामनगर में जमकर आंदोलन और संघर्ष हुआ, उसको भ्रष्टाचार इस कदर लील चुका है कि अब यह देखना है कि प्रशासन कोई कार्यवाही कर पाता है अथवा नही। मामले का खुलासा करने वाले आरटीआई कार्यकत्र्ता अजीम खान कहते हैं कि उक्त विवादित भ्ूामि में मकान बनाने वाले व्यक्तियों का संभवतया कोई दोष नहीं हैं। परंतु उक्त भूमि को सुनियोजित तरीके से प्लाटिंग कर बेचने वालों पर कडी कार्यवाही की जानी चाहिए। इसके साथ ही उक्त भूमि रोडवेज को मिलनी चाहिए। 24 बीघा में बस स्टेशन तो क्या आईएसबीटी बन जाता।
रामनगर। रामनगर में बस स्टेशन के लिए जिस 24 बीघा जमीन को आवंटित किया गया था। उसमें एक आईएसबीटी बन सकता था। गौरतलब है रामनगर कुमाऊं और गढवाल का प्रवेशद्वार है, इसके साथ ही राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों को राजधानी दिल्ली, देहरादून सहित कई बडे शहरों को जोडता है। यदि बस स्टेशन प्रस्तावित भूमि पर बनता तो शहर में लगने वाले टैªफिक जाम से भी निजात मिलती। लीज पर चल रहे मौजूदा बस स्टेशन की जगह किसी अन्य उपयोग में भी लाई जा सकती है।
अब हाईकोर्ट नैनीताल में याचिका दायर करेंगे आरटीआई एक्टिविस्ट।
रामनगर। सूचना के अधिकार में रामनगर के रोडवेज बस स्टेशन के भ्रष्टाचार का खुलासा करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट अजीम कहते हैं कि हमने आरटीआई मे खुलासे के बाद एसआईटी जांच की मांग की थी। लेकिन शासन ने कोई जांच नहीं की। जबकि परिवहन निगम के महाप्रबंधक उत्तराखंड दीपक जैन और अन्य अधिकारी सिर्फ आश्वासनों तक सीमित रह गए। अब अजीम कहते हैं कि अब वह सीबाआई जांच करवाने तथा मामले में कार्यवाही के लिए माननीय उच्च न्यायालय, नैनीताल में याचिका दायर करेंगे।

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