ganga dussehra
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Special on ganga dussehra

जगमोहन रौतेला

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कुमाऊँ सहित देश के कुछ हिस्सों में गंगा दशहरा (ganga dussehra) का पर्व परम्परा रुप से मनाया जा रहा है . यह हर वर्ष ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है . इस दिन को संवत्सर का मुख भी कहा जाता है .

इस दिन लोग गंगा के साथ ही दूसरी पवित्र माने जाने वाली नदियों में स्नान करते हैं और स्नान के बाद गंगा की पूजा व दान पुण्य करते हैं . माना जाता है कि इस दिन गंगा व दूसरी पवित्र नदियों में स्नान करने से घर में सुख – शान्ति होती है व समृद्धि का वास होता है .

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार , इसी दिन गंगा भगीरथ के दस हजार पुरुखों का तारण करने के लिए स्वर्ग से भू लोेक में आयीं थी . गंगा के लोककल्याण के लिए स्वर्ग से भू लोक में अवतरण के कारण ही हर वर्ष लाखों लोग ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा का एक तरह से आभार व्यक्त करने के लिए ही उसके पवित्र जल में स्नान करके खुद को भाग्यशाली मानते हैं .


ज्योतिषाचार्य पंडित भानुप्रतापनारायण मिश्र के अनुसार , वैदिक ज्योतिष में कहा गया है कि सूर्य की वृष और चन्द्रमा की कन्या राशि में गंगा का हिमालय से निर्गमन हुआ .

वैदिक व पौराणिक ग्रन्थों श्रीमद्भागवत व महाभारत आदि में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है . वामन अवतार में ब्रह्मा ने अपने लोक में नारायण के पैर धोए थे , जिससे गंगा का जन्म हुआ .

मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पूर्वज भगीरथ ने अपने पूर्वजों को तारने के लिए ब्रह्मा की आराधना की तो उन्होंने भगीरथ के 60 हजार पुरुखों के तारण के लिए गंगा को पृथ्वी में जाने को कहा . तब गंगा ने ब्रह्मा से कहा कि मैं तो पृथ्वी में लोक कल्याण के लिए जाने को तैयार हूँ , लेकिन मेरा तीव्र वेग कौन थामेगा ? गंगा के इस प्रश्न का कोई उत्तर ब्रह्मा के पास नहीं था .


भगीरथ ने इस प्रश्न के हल के लिए ब्रह्मा से गुहार लगाई तो उन्होंने इसके लिए भगीरथ से महादेव की अराधना करने को कहा . शिव ने भगीरथ की अराधना से प्रसन्न होकर भगीरथ से कहा , ” बोलो , क्या वरदान चाहिए ?” तब भगीरथ ने महादेव से अपनी व्यथा कह डाली और कहा कि गंगा उनके पुरुखों के तारण के लिए भू लोक में आने को तैयार तो हैं , लेकिन उनका तीव्र वेग कौन थामेगा ? आपसे याचना है कि आप अपनी जटाओं के माध्यम से गंगा के तीव्र वेग को थामने का निवेदन स्वीकार करें “.

महादेव चूँकि भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न थे और उनसे वरदान मॉगने को कह चुके थे , लिहाजा उन्होंने भगीरथ के निवेदन को स्वीकार किया और वे भू लोक में लोक कल्याण के लिए उतर रही गंगा का तीव्र वेग अपनी जटाओं के माध्यम से थामने को तैयार हो गए .


गंगा जब महादेव की जटाओं से मुक्त होकर भू लोक में उतरी तो जिस रास्ते से वह कपिल मुनि के गंगासागर स्थित आश्रम की ओर जा रही थी , वहीं रास्ते में जाहुन मुनि तपस्या में लीन थे . गंगा के तीव्र वेग से होने वाली आवाज से उनकी तपस्या में खलल पड़ा तो उन्होंने कुपित होकर पूरी गंगा को ही उदरस्थ कर एक तरह से कैद कर लिया , हॉलाकि महादेव के आदेश पर जाहुन मुनि ने गंगा को अपनी कैद से आजाद कर दिया .

जाहुन मुनि द्वारा गंगा के पूरे जल को पी लिए जाने के कारण ही गंगा का दूसरा नाम जाह्नवी पड़ा . जाहुन मुनि द्वारा मुक्त किए जाने के बाद गंगा गंगा सागर स्थित कपिल मुनि के आश्रम पहुँची और भगीरथ के 60 हजार पुरुखों का तारण गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से हुआ . जिसके बाद उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई .

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ganga dussehra

महाभारत के अनुसार , हर रोज गंगा जल पीने वाले मनुष्य के पुण्य की गणना नहीं हो सकती है . इसी वजह से सनातन धर्म का पालन करने वाले अधिकतर घरों में गंगा का पवित्र जल हमेशा रखा रहता है .

जिसका उपयोग पूजा व दूसरे अनुष्ठानों में अवश्य किया जाता है . स्कंदपुराण की मान्यतानुसार , गंगा दशहरा (ganga dussehra) पर गंगा में स्नान , ध्यान व दान अवश्य करना चाहिए .

स्नान के बाद गंगा स्तोत्र का पाठ भी अवश्य करना चाहिए . इससे मनुष्य में सद्दविचार आते हैं और लोक कल्याण की भावना भी जागृत होती है , जिसके फलस्वरुप घर में सुख – शान्ति का वास होता है .


पौराणिक मान्यतानुसार , गंगा की पूजा करते समय उसमें उपयोग की जाने वाली सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए . जैसे दस प्रकार के फूल , दस प्रकार के ही गंध , दस दीपक , दस प्रकार के नैवेद्य , दस पान के पत्ते , दस प्रकार के फल आदि . जो लोग गंगा दशहरा (ganga dussehra) के पर्व पर गंगा में स्नान के लिए नहीं जा सकते हैं , वे दूसरी नदियों में गंगा मैय्या का ध्यान करके स्नान कर सकते हैं .

स्नान करते हुए उन लोगों को ” गंगे च यमुने चैव गोदावरी – सरस्वती . नर्मदे – सिन्धु – कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु ” का मंत्र बोलना चाहिए .


गंगा को कलयुग का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण तीर्थ भी माना गया है . इसी कारण कहा गया है कि गंगा के दर्शन मात्र से ही भूलोक से मोक्ष मिल जाता है अर्थात् ” गंगा तव दर्शनात मुक्ति : “. भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को नदियों में गंगा भी कहा है .


गंगा दशहरा (ganga dussehra) का कुमाऊँ में विशेष महत्व है . इस दिन यहॉ स्नान , ध्यान व गंगा का पूजन करने की परम्परा है . इसके साथ ही यहॉ के लोक जीवन में गंगा को प्राकृतिक आपदाओं व आकाशीय बिजली से बचाने वाला भी माना जाता है .

यह भी मान्यता है कि इसको द्वार पर लगाने चोर व डाकु व लूटेरों का भय भी नहीं रहता है . इसी वजह से यहॉ के लोक जीवन में गंगा का विशेष महत्व है गंगा के महत्व को दर्शाने के लिए ही यहॉ हर घर के द्वार पर ” गंगा दशहरा द्वार पत्र ” (ganga dussehra dwara patra ) लगाने की भी प्राचीन परम्परा है .

गंगा दशहरा द्वार पत्रों (ganga dussehra dwar patra ) में शिव , गणेश , गंगा , हनुमान , सरस्वती आदि की आकृतियों को ज्यामितीय ढंग से बनाया जाता है . पहले कुल पुरोहित इसे विभिन्न रंगों का प्रयोग करते हुए अपने हाथ से बनाते थे और अपने हर यजमान के घर में परिवार की सुख , समृद्धि व यश वृद्धि की कामना के साथ देकर आते थे . इसके बदले में यजमान अपने कुल पुरोहित को सामर्थ्यानुसार दान – दक्षिणा देकर विदा करते थे .


गंगा दशहरा (ganga dussehra) से कई दिन पहले से ही पुरोहित ” गंगा दशहरा द्वार पत्र ” (ganga dussehra dwara patra ) बनाने में लग जाते थे , ताकि समय पर उन्हें बना सकें . पर बदलते समय व तकनीक का असर भी गंगा दशहरा के द्वार पत्रों (ganga dussehra dwara patra )पर भी पड़ा है . अब हस्तनिर्मित द्वार पत्र बहुत ही कम बनाए जाते हैं और बाजार में छपे हुए द्वार पत्र (ganga dussehra dwara patra )आसानी से मिल जाते हैं .

गंगा दशहरा के दिन परिवार के सबसे बुजुर्ग महिला या पुरुष द्वार स्नान , ध्यान व पूजा के बाद घर के हर द्वार पर ” द्वार पत्र ” चिपकाया जाता है और मॉ गंगा से प्रार्थना की जाती है कि पूरे साल उनके परिवार व गॉव में सुख – समृद्धि का वास हो और परिवार व गॉव पर दुखों की छाया भी न पड़े .


ज्योतिषाचार्य पंडित बसन्त बल्लभ लेखक कुमाऊँ में गंगा द्वार पत्र (ganga dussehra dwara patra ) लगाए जाने की परम्परा के बारे में कहते हैं ,” जब गंगा स्वर्ग लोक से लोक कल्याण की भावना लेकर भू लोक पर आयीं तो सप्तऋषि कूर्मांचल में ही तपस्या रत थे .

गंगा के पृथ्वी पर आने पर उन्होंने उनका पूजन किया और उसके पवित्र जल को अपने ऊपर छिड़का . उसके बाद सप्तऋषियों ने गंगा के स्वागत के लिए अपने – अपने आश्रमों के द्वार पर द्वार पत्र (ganga dussehra dwara patra ) लगाए .ज्योतिषाचार्य लेखक के अनुसार , गंगा द्वार पत्र (ganga dussehra dwara patra ) कोे गृह दोष , पित्र दोष व वास्तु दोष का निवारण करने वाला भी माना जाता है . सुरेश चंद्र पंत के अनुसार , दशहरा द्वार पत्र में जो श्लोक/मंत्र लिखा जाता है वह इस तरह है :—


” अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च ।
सुमन्तुजैमिनिश्चैव पञ्चैते वज्रवारका: ॥1॥
मुने: कल्याणमित्रस्य जैमिनेश्चापि कीर्तनात् ।
विद्युदग्निभयं नास्ति लिखितं गृहमण्डले॥2॥
अनन्तो वासुकि: पद्मो महापद्ममश्च तक्षक: ।


कुलीर: कर्कट: शङ्खश्चाष्टौ नागा: प्रकीर्तिता: ॥3॥
यत्राहिशायी भगवान् यत्रास्ते हरिरीश्वर: ।
भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा ॥4॥”
इस श्लोक में सप्तऋषियों की महत्ता का वर्णन किया गया है . लेखक चन्द्रशेखर तिवारी कहते हैं ,” गंगा दशहरा (ganga dussehra) के दिन कुमाऊँ में चीनी और कालीमिर्च का शर्बत पीने – पिलाने की भी परम्परा है . माना जाता है कि इस दिन यह शर्बत मिले से मनुष्य पूरे साल निरोग रहता है . गंगा दशहरा (ganga dussehra)
को इस तरह मनाने की यह अलग परम्परा कुमाऊँ में है .

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