लेखक डा. नवीन ने अपने नजरिए से की है प्रसांगिक मुद्दे पर लिखे गए उपन्यास की समीक्षा
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शेक्सपियर के तमाम उपन्यास कहानियां देश दुनिया में लोगों को हमेशा आकर्षित करते हैं। वह युग सुखांत नाटको , कहानियों एवं उपन्यास से इतर दुखांद नाटकों की रचना का युग बन रहा था । शेक्सपियर के युग में दुखांद नाटक,कहानी व उपन्यास का बहुत सुंदर प्रचलन आरम्भ हो गया । दुनिया भर का पाठक हमेशा से प्रसन्न अंत चाहता है । लेकिन यथार्थवादी के इस युग में पुनर्जागरण ने नए पाठक गढ दिए जिन्होंने सहर्ष दुखांद नाटक कहानी , उपन्यास को स्वीकारा और गले लगाया। वहीं भारत में लोग आज भी सुखांद के मोहपास में रचे बसे हैं… हमारे देश का पाठक भावनाओं के अतिवाद में डूबा रहता है और धार्मिक कूपमंडूप सागर किसी काल्पनिक नायक से सब कुछ उद्घार कर देने, की कपोकल्पना के चलते, सच्चाई और यथार्थ को स्वीकार नहीं, करता है । लेकिन आजादी के बाद अनेक लेखक छायावादी युग में ऐसे ही यथार्थवाद पर लिख कर नई, धारा को भारत में स्थापित करके ही, नही अपितु बहुत हद तक प्रसिद्ध भी कर गए, या यह माना जाना चाहिए कि दुखांद रचनाओं के युग में ही नहीं सम्पूर्ण साहित्यिक संसार में यथार्थवाद की तूती बोलने पर मजबूर कर दिया। जो यत्न आज भी जारी है। धार्मिक व भाववादी बलिवेदी से दूर बहुत लेखक इस यथार्थवाद के लिए सुंदर पाठक वर्ग बना रहा, है,, “”सुरिभ सिंघल”” में वही छवी दिख रही जो यथार्थ को सामने लाने में कहीं कमजोर नहीं बल्कि यथार्थवादी प्रचलन में नया मार्ग बना रही हैं, और अपनी कहानी को बहुत मजबूत ढंग से प्रस्तुत कर रही हैं । सुरभि सिंघल जी एक मंजी हुई लेखिका के रूप में लेखन के आलोक में स्थापित हो रही हैं। दुनिया भर और देश के संस्कृति में हो रहे बदलावों को समझते हुये सुरभि सिंघल का साहित्य कथानक पाठकों को अंत तक बांधे रखने में पूर्ण, सफल हुआ है। जिसने लेखिका की लेखनी को प्रमाणित और अपने काम को सफल कर दिया है।