“कब शिक्षकों के द्वारा ही अन्य शिक्षक से जातिगत भेदभाव ख़त्म होगी ? कब दलित वर्ग से आएं शिक्षकों को विद्यार्थियों के साथ शिक्षक भी सम्मानपूर्ण नजरों से देखेंगे ? कब सरकार जातिवाद के प्रति भी मानव शृंखला लगाएंगे ? क्या मानव शृंखला के नाम पर करोड़ों राशि सरकारी खजाने से घंटों भर में खर्च करना नादानी नहीं, अगर नहीं, तो फिर क्यों जबरदस्ती शिक्षकों को अवकाश के दिन यह जिम्मेदारी दे दी जाती है कि लोगों को ‘लाइन’ लगाने के लिए इकट्ठा किया जाय ? क्या यह सिर्फ दिखावा है या कुछ और, लेकिन जो भी है… पीसता शिक्षक ही है !”
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हिंदी उपन्यास ‘the नियोजित शिक्षक’ में उद्धृत यह वाक्य शृंखला हैं, जिसे पढ़ते हुए, यह मालूम होता है कि-
‘जो शिक्षक देश भर के बच्चों का भविष्य बनाते हैं, उनके वर्त्तमान व भविष्य के हालात पर आजतक किसी सरकार ने कुछ नहीं कहा।’
यह उपन्यास पढ़कर मालूम होता है कि आँखों के सामने घटनाएँ घटित सी हो रही है। एक जगह लिखा गया है कि-
”भूख ने उसे इतना परेशान किया कि वह खून बेचकर ‘पेट’ भर पाया।”
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विद्यार्थी लाइफ में सही में ऐसी कई घटनाएँ होती हैं, जब पैसों के अभाव में स्टूडेंट्स कुछ भी कर जाते हैं, यहाँ खुद का खून बेचकर पेट भरने वाली बात आँखें भर देती है।
पिता और पुत्र के बीच जैसे बातचीत होती हैं, वैसा ही बातचीत पुस्तक में पढ़ने को मिला। पढ़ते-पढ़ते ऐसा लगने लगा कि-
‘नायक मैं हूँ और मैं अपने पिताजी से बात कर रहा हूँ।’
उपन्यास में घटित घटनाएँ हमारे आसपास के माहौल से बिल्कुल मेल खाती और प्रतीत दिलाती है कि-
‘युवा उम्र में प्रेम की परिभाषा एकदम उपन्यास अनुसार ही होते हैं।’
साहित्यिक भाषा में प्रयोग करते हुए उपन्यास लिखा गया है, जिसकी कहानी एकदम से ‘कालजयी’ है।
समीक्षक रमेश कुमार 12 वीं के छात्र है और भागलपुर में रहते हैं।