अमृतलाल नागर और लखनऊ से जुड़ी उनकी यादें

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बंधु कुशावर्ती


अपने बचपन से मनिधन तक लखनऊ लिखते-जीते आये अमृतलाल नागर की पुण्य तिथि ’23 फरवरी’ फिर आ गयी। अब से 28 साल पहले इसी तारीख को नागरजी का ‘हंसा’ उड़ कर उनकी पार्थिव-काया छोड़ गया था।इसके बाद कुछ बरसों तक तो यह लखनऊ शहर उन्हें याद करता रहा,जिसमें सबसे ज़्यादा भूमिका उनके छोटे बेटे शरद नागरजी की ही रहती आयी।फिर क्या और कौन और अमृतलाल नागर या देश भर में स्वातन्त्रयोत्तर लखनऊ की हिन्दी कहानी-उपन्यास की प्रसिद्ध कथात्रयीःयशपाल भगवतीचरण वर्मा एवं अमृतलाल नागर। इस शहर की साहित्यिकों व बौद्धिकों की जमात के बजाय इन मूर्धन्य हिन्दी साहित्यकारों के परिवारीजन ही इनकी जन्म-पुण्य तिथि पर इन्हें याद करने के माध्यम बनते रहे हैं। नागरजी की शताब्दी का होना,कमोबेश उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान और केन्द्र सरकार की साहित्य अकादेमी की पहल पर लखनऊ में एक हद तक जाहिर भी हो गया,पर यशपाल और भगवती बाबू जन्मशती तो लगभग नामालूम ही रही। ऐसे में लखनऊ की इन तीनों साहित्यिक विभूतियों की पुण्यतिथि नामालूम ही निकल जाय तो अचम्भा कैसा?
परन्तु लखनऊ में नागरजी की जन्मतिथि या पुण्यतिथि का गु़ज़र जाना तकलीफदेह इसलिये है कि वह इस शहर की धड़कन,रवायत,संस्कृति,लोक-व्यवहार ही नहींं बल्कि रग और रंग-रेशे से रचे-बसे हुए थे।उनके रचे हुए साहित्य का बडा़ हिस्सा पुराने और नवाबी दौर के लखनऊ से लेकर खुद उन के आखि़री दौर तक के लखनऊ को बयाँ करता है।

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